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EXCLUSIVE:'लोगों की आपबीती सुन शो में रोया, एक्टिंग नहीं की'

Mayank Shekhar | Jul 25, 2012, 10:55AM IST

आमिर खान इन दिनों अपने शो 'सत्यमेव जयते' की वजह से चर्चा में हैं। उन्होंने इस शो के जरिए जिस तरह से सामाजिक मुद्दों पर प्रकाश डाला, उसने क्या आम, क्या खास सबका दिल अंदर से झकझोर कर रख दिया। इस शो के जरिए एक बार फिर टेलीविजन की ताकत सामने आई जिसे केवल बुद्धू बक्सा समझकर छोटा कह दिया जाता था। 50 के दशक में एक बार जानेमाने टीवी पत्रकार एडवर्ड बरोस ने टीवी के बारे में कहा था कि मनोरंज़न से मन बहलाने और सीखने के लिए लिए इससे बेहतर कुछ भी नहीं हो सकता। टीवी से आप सीख सकते हैं, आप चीज़ों को जान सकते हैं, प्रेरित भी हो सकते हैं। लेकिन ये सब उन लोगों पर निर्भर करता है जो टीवी पर दिखाई जाने वाली चीजों की प्राथमिकता निर्धारित करते हैं।
एडवर्ड की इस सोच को आमिर खान ने 'सत्यमेव जयते' के माध्यम से सच कर दिखाया है। इस बात पर उन्होंने दैनिकभास्कर.कॉम के वरिष्ठ पत्रकार मार्क मैनुअल को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में सहमति जताई। मार्क की आमिर से काफी लंबी बातचीत हुई। इस इंटरव्यू के कुछ चुनिंदा अंश हम एक सीरीज के तौर पर आपके लिए लेकर आएंगे। पेश है आमिर के इंटरव्यू का दूसरा अंश:
आपकी पत्नी किरन का कहना है कि आप जल्द ही थैरेपी लेने वाले हैं?
 आमिर(हंसते हुए): हां, हम जल्द ही निकलने वाले हैं। मैंने अप्वॉइंटमेंट ले लिया है।
पर क्यों?
क्योंकि हमने इमोशनली कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। हम सब बुरी तरह थक गए हैं। फिल्हाल, मैं ठीक हूं। शूटिंग के दौरान हर तीसरे दिन मुझे पांच से छह लोगों के इंटरव्यू लेने होते थे। आपकी ही तरह वे सामने बैठ आपबीती सुनाते हैं। जिन हालात से वे गुजरे, उन्हें जानना एक दिल छू लेने वाला एक्सपीरिएंस होता है। ज्यादातर लोग जो उनकी व्यथा सुनते हैं, वे या तो साइकोएनालिस्ट्स होते हैं या फिर काउंसलर्स।
 
और जर्नलिस्ट्स भी
जी हां, जर्नलिस्ट्स भी। पर उन्हें भी कोई ट्रेनिंग नहीं मिलती। काउंसलर्स और साइकोएनालिस्ट्स जानते हैं कि कैसे लोगों के दुखों को ध्यान से सुनकर भी उसके बहाव में न बहें। जब हम कोई कहानी सुनते हैं तो हम उसमें खो जाते हैं और इसी का हम पर असर पड़ता है। हमारे बस में कुछ नहीं होता। शूटिंग के दौरान कई बार ऐसा होता कि मेरी आंखों में आंसू आ जाते, मैं अपने कमरे में जाता, आंसुओं को रोकने की कोशिश करता, चाय पीता और फिर काम पर लगता। कई बार तो ऑडियंस के सामने ही मैं रो पड़ता, फिर दस मिनट का ब्रेक लेता और कंटिन्यू करता।
ऐसा क्रिएटिव टीम के साथ भी हो रहा है। स्पॉट ब्वॉयज भी अछूते नहीं। शायद मुझ पर ज्यादा असर इसलिए हो रहा था, क्योंकि मैं ही लोगों से डायरेक्टली बातें करता हूं। क्या आप यकीन करेंगे कि शूटिंग के अंत में 13 कैमरामैन मेरे पास आए और कहा कि हर एपिसोड के अंत में आप लोगों से पैसे डोनेट करने को कहते हैं। हम आपको वे चेक सौंप रहे हैं, जो हमने कलेक्ट किए। हमने इस पर अपने नाम नहीं लिखे।
जिस तरह आप इस शो पर इमोशनल हो जाते हैं, उसे लेकर तरह-तरह की बातें कही जा रही हैं। आपको नहीं लगता कि आपको देख लोगों के पास कुछ वैसा ही संदेश जाता होगा? ज्यादातर एक्टर्स ऐसे सीन को करने के लिए आपबीती याद करते हैं। यह उनके काम का हिस्सा है। क्या आपने कभी इस तरीके से सोचा?
कभी नहीं, आप उस इंसान की कहानी में खो जाते हैं, चाहे आप कितने ही अच्छे एक्टर क्यों न हों। अगर मैं आपसे कहूं, 'आमिर जी, मैं बलिया से हूं और जब मैं 14 साल का था...' इसी पल आप पूरी तरह इन्वॉल्व हो जाते हैं। आपका सारा ध्यान मेरी बातों पर है। आप सोचते हैं कि अब मैं आगे क्या कहूंगा। मैं आपका इतिहास जानता हूं और उसी बारे में आपसे बात कर रहा होता हूं। लेकिन मैं यह नहीं जानता कि आप किस तरह अपनी आपबीती कहेंगे। आप कुछ इमोशनल हो कर कई ऐसी चीजें भी बता दे सकते हैं जो आपने सोची न हों। मैंने यह महसूस किया कि जैसे मैं लोगों से कनेक्ट कर पाता हूं, बातें करता हूं, उनके लिए एक कंफर्ट जोन बना पाता हूं और उनका विश्वास जीत पाता हूं, वही इस शो की सक्सेस का राज है।
 
आपको अपने अभिनेता के रूप से भी बाहर निकलने का ध्यान रखना होता होगा?
 हां, अगर मैं ऐसा न करूं तो काम वहीं पर खराब हो जाएगा। शो के एक दिन पहले मैं हर गेस्ट से मिलता था, करीब 15 से 20 लोगों से। हम साथ लंच करते थे, मैं उन्हें कंफर्टेबल फील करवाने की कोशिश करता था, बातें करता था, पर टॉपिक से हट कर।
 
 

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