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'नौटंकी साला'

Mayank Shekhar | Apr 12, 2013, 12:17PM IST
Genre: कॉमेडी
Director: रोहन सिप्पीी
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Plot: रावणलीला एक बेहतरीन नाटकीय प्रस्‍तुति है, जिसमें फिल्‍म का हीरो निर्देशक और रावण दोनों की भूमिकाएं निभाता है।

कहानी बुरी पर नौटंकी अच्‍छी!


रावणलीला एक बेहतरीन नाटकीय प्रस्‍तुति है, जिसमें फिल्‍म का हीरो निर्देशक और रावण, दोनों की भूमिकाएं निभाता है। मंचसज्‍जा और वेशभूषा दोनों भव्‍य नजर आते हैं। यदि आमिर रजा हुसैन की ‘द लीजेंड ऑफ राम’ को छोड़ दें तो यह अफसोस की बात है कि भारत में ब्रॉडवे या वेस्‍ट एंड किस्‍म के मुख्‍यधारा के भव्‍य रंगमंचों की परंपरा नहीं रही है। लेकिन जब हम फिल्‍म के भीतर यह नाटक देखते हैं, तो हम मन ही मन यह उम्‍मीद करने लगते हैं कि काश ऐसी कोई परंपरा रही होती। अलबत्‍ता मैंने अभी तक गुड़गांव के किंगडम ऑफ ड्रीम्‍स में जाकर यह नहीं देखा है कि उनकी भी प्रस्‍तुतियां वास्‍तव में इतनी भव्‍य होती हैं या नहीं।


बहरहाल, रावणलीला की पिछली 1500 प्रस्‍त‍ुतियां हाउसफुल रही हैं और ऐसा लगता है कि लोग इसे बार-बार देखने आ रहे हैं। (या कम से कम दर्शकों में एक व्‍यक्ति तो ऐसा है ही, जिसने हफ्ताभर पहले ही यह फिल्‍म देखी थी) यह बहुत पेशेवर किस्‍म की प्रस्‍तुति है। लेकिन यह बात समझ नहीं आती कि नाटक का निर्देशक और मुख्‍य चरित्र राम की भूमिका अपने ऐसे दोस्‍त को क्‍यों सौंप देता है, जो अभिनय करना तो दूर अपने संवाद भी ठीक से याद नहीं रख पाता। हां, यह जरूर होता है कि इससे रावणलीला को ‘जाने भी दो यारो’ के यादगार महाभारत दृश्‍य को टक्‍कर देने में मदद मिलती है, या शायद हो सकता है कि फिल्‍म का नायक ही अपने दोस्‍त को एक जॉब दिलाने के लिए कमर कसे हुए है। फिल्‍म का एक किरदार कहता भी है कि यदि आप जिंदगी में और कुछ नहीं कर सकते, तो अभिनेता तो बन ही सकते हैं और यदि वह भी नहीं कर सकते, तो एक निर्देशक बन सकते हैं। गोया कि ये दोनों लूजर्स जॉब हों।


लेकिन जाहिर है, यह सच नहीं है और इस फिल्‍म में अदाकारी और निर्देशन की जिस तरह की हुनरमंदी नजर आती है, उसे देखने के बाद तो यह मानना और कठिन हो जाता है। इससे पहले इसी निर्देशक की फिल्‍म 'ब्‍लफमास्‍टर' (2005) में मुंबई इतनी शांत और प्‍यारी नजर आई थी। ऐसा इसलिए मुमकिन हो पाया है कि इस फिल्‍म की अधिकांश शूटिंग दक्षिणी मुंबई में की गई है, ताज और हॉर्निमन सर्किल के दरमियान। यह बंबई का इकलौता ऐसा इलाका है, जो आज भी एक ग्‍लोबल मेट्रोपोलिस जैसा नजर आता है और कुछ-कुछ न्‍यूयॉर्क के मैनहटन की याद दिलाता है।


फिल्‍म के हीरो राम परमार (या आरपी) की भूमिका आयुष्‍मान खुराना ने निभाई है। पिछले साल रिलीज हुई ‘विकी डोनर’ की सफलता के बाद वे बॉलीवुड के सबसे प्रतिभाशाली उदीयमान अभिनेता के रूप में उभरे थे। वे इस फिल्‍म में भी अच्‍छी लय में नजर आते हैं। आरपी की अपने दोस्‍त मंदर से चंद रोज पहले ही मुलाकात हुई थी। वह उसे बीएफएफ (बेस्‍ट फ्रेंड फॉरेवर) कहकर बुलाता है। यह भूमिका कुणाल रॉय कपूर ने निभाई है। अनेक लोगों को थुलथुल काया का यह अभिनेता 'देल्‍ही बेली' (2011) के कारण याद होगा। यह फिल्‍म भी एक हल्‍की-फुल्‍की कॉमेडी है और इसका हास्‍यबोध सूक्ष्‍मतर है।


फिल्‍म के शुरुआती दृश्‍य में हमें दिखाया जाता है कि आरपी एक थैरेपिस्‍ट के करीब बैठा है और उसे समझाने की कोशिश कर रहा है कि आजकल उसे नींद नहीं आती। लेकिन कुछ ही देर में हम समझ जाते हैं कि वास्‍तव में मनोचिकित्‍सा की दरकार उसे नहीं उसके दोस्‍त को है। उसका दोस्‍त सामाजिक रूप से कटा-कटा रहता है, ज्‍यादा बोलता नहीं, शून्‍य में कुछ ताकता-सा रहता है, ऐसी चीजों की कल्‍पना करता रहता है, जो आकाश से सीधे उसके सिर पर गिर सकती हैं और दु:ख की बात है कि ऐसा होता भी रहता है, और वह बड़े बेढंगे किस्‍म के सवाल पूछता है। आरपी के साथ उसकी दोस्‍ती देखकर हमें वर्ष 1988 की फिल्‍म 'रेन मैन के रेमंड' (डस्टिन हॉफ़मैन) और 'चार्ली' (टॉम क्रूज) की याद हो आती है।


मुझे लगता है, दुनिया का हर इंसान किसी न किसी मोड़ पर अपनी जिंदगी खत्‍म करने के बारे में सोचता होगा, फर्क इतना ही है कि बहुत कम लोग इस सोच को सही साबित करने की भी कोशिश करते हैं। मंदर ऐसा ही करता है और आरपी उसकी जान बचाता है। मामला लड़की का है। मंदर का दिल टूटा हुआ है। आरपी तय करता है कि वह अपने दोस्‍त की मदद करेगा और उसे उसकी गर्लफ्रेंड का प्‍यार फिर से हासिल करवाएगा, हालांकि अब उनका ब्रेकअप हो चुका है। लेकिन वह ऐसा क्‍यों करना चाहता है? हमें बताया जाता है, क्‍योंकि वह एक बहुत अच्‍छा इंसान है और हमेशा दूसरों की मदद करने को तैयार रहता है।


इसी हफ्ते रोजर एबर्ट की मौत हुई है, लिहाजा यह उचित ही होगा कि मैं दुनिया के इस सबसे लोकप्रिय फिल्‍म समीक्षक की पंक्तियां उद्धृत करूं। वर्ष 2003 की फिल्‍म 'एप्रे वू' से ऊबकर एबर्ट ने लिखा था : हमारे दिमाग में एक ऐसा मीटर होता है, जो हमें बता देता है कि हम जो कॉमेडी फिल्‍म देख रहे हैं, वह मजेदार साबित हो रही है या नहीं। यदि नहीं तो मैं अपनी टाइमैक्‍स के इंडिग्‍लो फीचर का इस्‍तेमाल करने लग जाता हूं।


यह फिल्‍म वास्‍तव में उसी फ्रेंच फिल्‍म 'एप्रे वू' की अधिकृत रीमेक है, लिहाजा जो प्रॉब्‍लम ऑरिजिनल में थी, वह रीमेक में भी नजर आती है। प्रॉब्‍लम यह है कि फिल्‍म की कहानी में दम नहीं है। और इसके बावजूद यदि हम पाते हैं कि थिएटर में मौजूद लोग हंस रहे हैं, उसके सुरुचिपूर्ण छायांकन पर मुग्‍ध हो रहे हैं, बेहतरीन अदाकारी का मजा ले रहे हैं और फिल्‍म के साउंडट्रैक पर कदमताल कर रहे हैं तो हम समझ जाते हैं कि यह फिल्‍म अपनी कहानी से कहीं बेहतर है। शायद, ऐसा केवल कॉमेडी और म्‍यूजिकल फिल्‍मों के साथ ही संभव है। यह फिल्‍म कॉमेडी भी है और म्‍यूजिकल भी, और इतना तो कहा ही जा सकता है कि इन दोनों के रूप में वह हमें निराश नहीं करती।

 
 
 
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