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MOVIE REVIEW: D-DAY

dainikbhaskar.com | Jul 19, 2013, 00:00AM IST
MOVIE REVIEW: D-DAY
Genre: एक्शन
Director: निखिल आडवाणी
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Plot: 'डी-डे' एक जासूसी रोमांचक फिल्म है, जिसमें ऋषि कपूर, हुमा कुरैशी, इरफान व श्रुति हसन ने अभिनय किया है।

आइडिया गदर, प्‍लान गड़बड़


लगता है दाऊद का वास्‍तविक घर बॉलीवुड ही है। इस डॉन का जो इकलौता वीडियो हममें से बहुतेरों ने देखा है, वह नब्‍बे के दशक का है, जिसमें हम उसे शारजाह के क्रिकेट स्‍टेडियम में बैठा देखते हैं। लेकिन दाउद के मिथक को मिलन लूथरिया की वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई (जिसकी सीक्‍वेल जल्‍द ही आने वाली है), शूटआउट एट लोखंडवाला और वडाला, रामगोपाल वर्मा की कंपनी और डी शीर्षक वाली अनेक फिल्‍मों ने जिंदा रखा है।


यह फिल्‍म हमें कराची के क्लिफटन स्थित व्‍हाइट हाउस मेंशन को दिखाती है, जिसमें विलेन अपने गुर्गों के साथ बैठा है, बिरयानी खा रहा है, हैदराबाद में बम धमाका करने के लिए अपने स्‍लीपर सेल को मुस्‍तैद कर रहा है, खुद को एक बिजनेसमैन कहता है, आईएसआई के चीफ और अपने मेजबानों पर भौंकता है, लाल सुर्ख चश्‍मा पहनता है और यह पूरा दृश्‍य देखने के बाद हम समझ जाते हैं कि इस फिल्‍म की मुख्‍य दिलचस्‍पी इस तरह के विजुअल ब्‍योरों में ही अधिक है। लेकिन कम से कम यहां डॉन को सड़कों के बादशाह या किसी इंटरनेशनल सिंडिकेट का आका तो नहीं दिखाया गया है। यहां उसे उसी रूप में दिखाया जा रहा है, जैसे उसे दिखाया जाना चाहिए, यानी पाकिस्‍तान में पल रहा एक जघन्‍य अपराधी। एक आलीशान महल में कायरों की तरह छुपे रहने के कारण वह बेचैन हो रहा है। वह अपने बेटे की शादी का जश्‍न मनाने के लिए होटल में एक पार्टी में जाना चाहता है, लेकिन आईएसआई उसे जाने नहीं देती। लेकिन वह उसकी एक नहीं सुनता। इस तरह उस होटल पर चार रॉ एजेंटों का ध्‍यान केंद्रित हो जाता है, जो हमारे देश के इस मोस्‍ट वांटेड गुनहगार को भारत ले आने के लिए बेताब हैं।


फिल्‍म की शुरुआत दाउद के योजनाबद्ध अपहरण के एक धांसू सीक्‍वेंस से होती है। इसमें कोई शक नहीं कि हाल-फिलहाल के दिनों में हमारे मुख्‍यधारा के सिनेमा में इससे अधिक साहसी किसी विचार पर काम नहीं किया गया है। अमेरिका में फिल्‍मकारों ने डेथ ऑफ अ प्रेसिडेंट नामक फिल्‍म के लिए राष्‍ट्रपति जॉर्ज डब्‍ल्‍यू बुश को उनके दफ्तर में ही गच्‍चा दे दिया था, लेकिन बाद में कुछ भी नहीं हुआ। भारत में ऐसी किसी चीज की कल्‍पना करना भी कठिन है, जहां सभी को, यहां तक कि एक खौफनाक डॉन को भी कोई पवित्र वस्‍तु माना जा सकता है।


पाकिस्‍तान तो क्‍या दुनिया के किसी भी मुल्‍क में इस स्‍तर का कारनामा कर गुजरने वाले खुफिया एजेंट्स के लिए सबसे पहली जरूरत तो यह होती है कि वे बेहतरीन अभिनेता हों। इस फिल्‍म में काम करने वाले कलाकार इरफान, आकाश दहिया, हुमा कुरैशी, अर्जुन रामपाल भी आला दर्जे के कलाकार हैं। इनमें से हर एक की एक कहानी है, लेकिन वह इतनी गैरजरूरी है कि उनसे सहानुभूति रख पाना मुश्किल लगता है। कहानी के केंद्र में ऋषि कपूर हैं। घनी मूंछों वाले इस किरदार के बारे में बताने की जरूरत नहीं कि वह कौन है। लेकिन इस अदाकार के बारे में जरूर बात किए जाने की जरूरत है। ऋषि कपूर अब एक भूखे अभिनेता बन चुके हैं, जिन्‍होंने अपनी जवानी से लेकर अधेड़ उम्र तक का वक्‍त तो रोमांटिक भूमिकाओं में बिताया, लेकिन अब वे अपनी प्रतिभा की नई संभावनाओं को तलाश रहे हैं, जैसा कि हमने लक बाय चांस, दो दूनी चार, औरगंजेब, अग्निपथ जैसी फिल्‍मों में देखा। वे इस फिल्‍म में इकबाल की भूमिका निभा रहे हैं, जिसका चरित्र निश्चित ही दाउद इब्राहिम पर आधारित है।


सिनेमा की स्‍क्रीन पर हमने सबसे पहले दाउद को वर्ष 2004 में आई अनुराग कश्‍यप की डाक्‍यू-ड्रामा फिल्‍म ब्‍लैक फ्राइडे में देखा था, जो 1993 के मुंबई धमाकों पर आधारित थी। पहले इस फिल्‍म को रामगोपाल वर्मा निर्देशित करने वाले थे। वर्मा चाहते थे कि वे दाउद को 1992 के मुंबई दंगों के बाद हाथों में चूडि़यां थामे दिखाएं, जो उन्‍हें पड़ोस के डोंगरी की महिलाओं द्वारा भेजी गई थीं। यदि ऐसा होता तो ब्‍लैक फ्राइडे बहुत जुदा किस्‍म की फिल्‍म होती, लेकिन गनीमत है कि ऐसा नहीं हुआ। इस फिल्‍म में भी इसी बात की जरूरत थी कि फिल्‍मकार इस विषय को और संजीदगी से उठाते।


हाल ही में इरफान ने एक इंटरव्‍यू में कहा कि यदि इस फिल्‍म में सलमान खान होते तो इसे उस तरह नहीं बनाया जा सकता था, जैसे बनाया जाना चाहिए था। शायद उनका इशारा रोमांटिक और रोमांचक एक था टाइगर की ओर था। फिल्‍म के निर्देशक निखिल आडवाणी इससे पहले सलाम-ए-इश्‍क में सलमान के साथ काम कर चुके हैं। वे शाहरुख के साथ कल हो न हो, अक्षय कुमार के साथ पटियाला हाउस और चांदनी चौक टु चाइना भी बना चुके हैं, लेकिन यह निश्चित ही उनकी सबसे चुनौतीपूर्ण फिल्‍म है। शुरुआत में तो फिल्‍म पर उनकी पकड़ पूरी तरह मजबूत नजर आती है। यह फिल्‍म देखते हुए हमें कैथरीन बिगेलो की जीरो डार्क थर्टी और माइकल विंटरबॉटम की अ माइटी हार्ट याद आ सकती है, क्‍योंकि ये दोनों ही फिल्‍में पाकिस्‍तान में किसी एक शख्‍स की खोजबीन के बारे में हैं। लेकिन इंटरवल के बाद यह अपनी लय खोने लगती है, जैसा कि अनेक बॉलीवुडीय फिल्‍मों के साथ होता है। इस फिल्‍म के बारे में तो यह भी कहा जा सकता है कि यदि य‍ह इंटरवल पर ही खत्‍म हो जाती तो बेहतर होता।


लिहाजा, लोगों के शरीर गोलियों से छलनी होने लगते हैं। गोलीबारी आम हो जाती है। हर तरह के वाहन आसानी से मुहैया होते हैं और दीवाली के चॉकलेट बम के आकार के डिवाइसेस आधी इमारत को धराशायी करने में सक्षम होते हैं। हमें कुछ ऐसे गंभीर जासूसों के बारे में बताया जाता है, जो हमेशा एक-दूसरे के साथ रहते हैं और कभी अपने रहने की जगह नहीं बदलते। यहां तक कि उनमें से एक तो उसी चकलाघर में चला जाता है, जहां उसे पता है कि सभी उसकी तलाश कर रहे हैं। शायद वह पकड़ाए जाने को बेताब होगा। दूसरी तरफ आईएसआई चीफ नेशनल सिक्‍योरिटी से जुड़े फैसले तुरत-फुरत में लेता रहता है। फिल्‍म में जब हम उसे आखिरी बार देखते हैं, तब वह भारत-पाक सीमा पर नाच रहा होता है। जैसे ही फिल्‍म के जासूसी एजेंटों का डॉन को धर दबोचने का प्‍लान फेल हो जाता है, उन्‍हें समझ ही नहीं आता कि अब क्‍या करें और कहां जाएं। दुख की बात है कि यही बात इस फिल्‍म के बारे में कही जा सकती है।



 

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