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ग्रांड में दम नहीं हम किसी से कम नहीं

Mayank Shekhar | Sep 13, 2013, 10:45AM IST
ग्रांड में दम नहीं हम किसी से कम नहीं
Genre: कॉमेडी
Director: इंद्र कुमार
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Plot: आदर्शतौर पर तो यह फिल्म रिव्यू के लायक भी नहीं है और इसे यह सम्मान दिया जाना भी उचित नहीं है
ऐसे तो यह फिल्म रिव्यू के लायक भी नहीं है और इसे यह सम्मान दिया जाना भी उचित नहीं है। फिर भी मैं इसके पहले ही दृश्य से आपको बता देना चाहता हूं कि इस फिल्म के बारे में आगे कुछ कहना कितना निरर्थक है। इस फिल्म में तीन जेंटलमैन ऐसे नजर आते हैं, मानो सीधे किंडरगार्टन से कॉलेज में उठकर आ गए हों। फिल्म की शुरुआत स्टूडेंट्स को लेक्चर देने से होती है कि किस तरह उन्होंने आजतक गलत अल्फाबेट्स पढ़े थे! जैसे कि इनके अनुसार 'A' फॉर एप्पल नहीं होता, बल्कि यह  'A' फॉर होता है...और इतना कहते ही कैमरा एक औरत के बैक पोर्शन की ओर जाता हुआ नजर आता है और उसके नितंबों को दिखाया जाता है। इसी तरह 'B' फॉर... होता है और अब आपको फिल्म में कई सारी महिलाओं के ब्रेस्ट के टाइट क्लोजअप दिखाई देने लगते हैं।
 
आगे तो हद ही कर दी और ये कहते हैं 'C' फॉर... और आगे कुछ नहीं कहा जाता, लेकिन महिलाओं के उस अंग के बारे में कहना चाहते हैं, जिसके बारे में दर्शकों को इमेजिन करने के लिए मजबूर किया जाता है। फिर कहा जाता है 'D' फॉर... दिल से और इसी तरह फिर आगे एफ फॉर क्या होता है, यह बताने की कोशिश की जाती है। आप समझ सकते हैं कि  फिल्म के नेचर के लिहाज से 'F' फॉर... के लिए क्या इमेजिन किया जा सकता है? ठीक इसके बाद एक औरत अपनी क्लीवेज पर पड़ी आइस्क्रीम को एक फब्बारे में साफ करते हुए अगले दृश्य में दिखाई देती है।
 
वाकई इस तरह का ह्यूमर निचले दर्जे का है। हम जानते थे कि यह फिल्म पूरी तरह से डबलमीनिंग संवादों से भरपूर है।मेल प्राइवेट पार्ट पर भद्दे जोक्स और भी बहुत कुछ है कॉमेडी के नाम पर इस फिल्म में! इस तरह से आपको फिल्म देखते वक्त वाकई इस सवाल से जूझना पड़ेगा कि क्या हम कोई सेक्स कॉमेडी तो नहीं देख रहे? क्या यह एडल्ट मूवी ही तो नहीं है? 
 
एक तरह से उन्होंने सेक्स को मूवी या कह लें जिंदगी में बढ़ावा दे दिया है। 14-15 साल के बच्चे जो शायद इस फिल्म देखने नहीं आएंगे, लेकिन आ भी जाएं तो हो सकता है कि वे इस तरह की अश्लील शरारत पर हंसे। न्यूड मैन या मेल-फीमेल के बॉडी पार्ट को लेकर की लगातार की जा रही बातों से उन्हें हंसी आए। लेकिन मेरे लिहाज से हर वो चीज जिससे हंसी आ जाए, ह्यूमर नहीं है। मैं मानता हूं कि इस तरह की हंसी ह्यूमर के लिए नहीं होगी, बल्कि यह खिलखिलाहट बोले गए कुछ शब्दों के साथ किए गए दुस्साहस का नतीजा है।
 
दूसरी ओर, भारतीय सिनेमा काफी हद तक भारतीय समाज की तरह है, जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं। यहां समाज में पीढ़ियों से चली आ रही यौन कुंठा को भी याद रखा जाना चाहिए। इस लिहाज से कुछ हंसी के फब्बारे जो इस तरह की फिल्मों से उठते हैं, वे सहज प्रतिक्रिया बन जाते हैं। 
थिएटर में मेरे पास कम से कम आधी से ज्यादा लाइन इंटरवल तक खाली हो चुकी थी। मेरी एक सलाह है कि इस तरह की फिल्मों को देखने के लिए अपने दिमाग को पीछे रखकर जाएं। 
 
इस सीक्वेल की पहली फिल्म 'मस्ती' को यदि मैं याद करूं तो फिर भी उसमें बहुत सारी मस्ती थी। यही नहीं, उसमें एक कहानी भी थी और इस फिल्म में स्टोरी ही मौजूद नहीं है। तीन शादीशुदा लड़के एक बार मिलकर अपने कॉलेज में पुरानी यादों को ताजा करने के लिए जाते हैं और वहां उन्हें तीन पोर्न स्टार टाइप दोस्त मिलती हैं। कॉलेज के प्रिंसिपल की पत्नी, उनकी बेटी और बहन - जो इन बेवकूफों के साथ कैसे भी डांस करने और और सोने के लिए मानों मरी जा रही हों। इसके कारण ये लड़के मुसीबत में फंस जाते हैं और उनकी पत्नियां अचानक उनकी इस मस्ती में शामिल हो जाती हैं। फिर वे अपनी हरकतों को सुधारने की पूरी कोशिश का ताना-बाना बुनते हैं। आधे घंटे तक फिल्म कुछ ठीक-ठाक लग सकती है।  
 
फिल्म देखते-देखते मेरे कानों में कुछ स्पंदन-सा होता है।साफ कहूं तो दिमाग अपनी जगह पर नहीं लगता, क्योंकि कुछ मजेदार चीजें मैंने उस दौरान जरूर पाईं और बताना जरूरी है।
बहरहाल, प्रिंसिपल के परिवार की इन औरतों के नाम भी बड़े मजेदार हैं। इन्हें रोज, मेरी और मार्लोवे कहकर पुकारा जाता है। ऐसा लगता है, जैसे स्क्रीन राइटर ने इस जोक को खूब पसंद किया हो और बार-बार इन तीनों के नाम पुकारकर फिल्म में वाकई एडल्ट ह्यूमर पैदा करने के लिए मेरी रोज मार्लोवे का साउंड क्रिएट कर अश्लीलता की हदों को पार करने का स्क्रीन राइटर भरपूर प्रयास करता है।
 
 
 
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